Tuesday, October 13, 2009

Ek mutthi aasman

क्यूँ मुट्ठी भर आसमान नहीं मिलता
क्यूँ सन्नाटों के सवाल गूंजते रहते हैं
और क्यों जवाब नहीं बोलते
बोलती है तो बस खामोशी

एक कहानी गुनगुनाती हुई
दुनिया ख़ूबसूरत थी कभी
किसी ज़माने में चाँद पर परियों का डेरा था
और आम के पेड़ पर लगी कैरी मीठी

गाँव के आसमान में तारे भी बहुत थे
तबसे पेड़ बहुत बड़ा हो गया है
और गंगा में बहुत पानी बह चुका है

लेकिन खामोशी अब भी कुछ कहती है
क्यूँ आसमान अपना आँचल समेत लेता है
क्यूँ एक मुट्ठी आसमान मयस्सर नहीं होता
शायद अर्थशास्त्र या समाजवाद के सिद्धांतों में सिमट गया है

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